कैसे मिक्सर ग्राइंडर बेचने वाले ने बनाया मैकडॉनल्ड को सफल

Mcdonald

मिक्सर ग्राइंडर बेचने की नौकरी के दौरान, रे क्रोक एक अलग रेस्तरो में पहुचे जिसका नाम मैकडॉनल्ड था जहा रे क्रोक ने ग्राहकों को स्वयं के लिए सेवा करते हुए पाया | रे क्रोक ने वहा देखा कि ग्राहकों की लम्बी लाइन है ओर सभी ग्राहक लम्बी लाइन में मुस्कुराते हुए खड़े है | रे क्रोक ने कई ग्राहकों को रोकते हुए बात भी कि यहाँ की क्या खास बात है | उन सब ने रे क्रोक को बताया कि “अगर आप को बेस्ट हेम बर्गर सिर्फ 15 मिनट में चाहिए तो आप सही जगह खड़े है” | 

रे क्रोक को ये नया तरीका पसंद आया और उसने उस रेस्त्रो के मालिक रिचर्ड और मौरिका मैकडॉनल्ड से उसी तरह से रेस्तरां चलाने का लाइसेंस खरीद लिया | लेकिन रिचर्ड और मौरिका मैकडॉनल्ड इस रेस्तरों को साइड बिज़नस के तोर पर चला रहे थे इसीलिए वे रे क्रोक की सलाहों को नहीं मानते थे और उस रेस्तरों में काफी नुकसान भी हो रहा था | तब रे क्रोक ने उस रेस्तरों को पूरा खरीदने का फैसला किया और उसने अधिक कीमत चुका कर मैकडॉनल्ड को खरीद लिया |

मैकडॉनल्ड की सफलता के पीछे तीन सिद्धांत

अब रे क्रोक पूरी तरह से आजाद थे मैकडॉनल्ड को अपने तरीके से चलाने के लिए | रे क्रोक ने मैकडॉनल्ड को सफल बनाने के लिए तीन सिद्धांत बनाए :

  1. निरंतर बेहतरीन स्वाद
  2. स्वस्थ –स्वच्छ वातावरण
  3. ग्राहक की अच्छी सेवा

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रे क्रोक ने करे कई प्रयोग करे ताकि वो ग्राहकों को स्वादिष्ट हेम बर्गर दे सके | उसने आलू को अलग अलग टुकड़े को अलग अलग तेल के ताप में तल कर देखा और फिर जाना कि इस आकार का टुकड़ा, इतने गरम तेल में, इतने समय तक तलने पर बेहतरीन स्वाद देता है | हजारो प्रयोग करके उन्होंने हर तरह के पकवान को बेहतरीन स्वाद वाला बनाया और एक जैसे स्वाद के लिए सूत्र को लिख दिया | इन तीनो सिद्धांतो को लागू करने के कारण मैकडॉनल्ड , का नाम दूर दूर तक फ़ैल गया | अब रे क्रोक अपना व्यवसाय को ओर आगे ले जाना चाहते थे | वे मैकडॉनल्ड की कई शाखाएं खोलना चाहते थे | हर शाखा के लिए जरुरी था पूंजी, मेहनत और समय | रे क्रोक को पूंजी और मेहनत की परेशानी नहीं थी मगर समय की दिक्कत थी | ज्यादा से ज्यादा रे क्रोक दो रेस्तरों को संभाल सकते थे और शाखाओ में उनको मैनेजर रखना पड़ता मगर रे क्रोक अपने काम में बड़े पक्के थे उनका सोचना था कि नौकर आखिर नौकर की ही तरह काम करेगा वो मालिक की तरह जिम्मेदारी नहीं उठाएगा | रे क्रोक ने सोचा कि मैकडॉनल्ड की शाखाओ को नौकर ना चला कर मालिक चलाए और उसी तरह से चलाए जैसे वो चलाता है तो मैकडॉनल्ड की हर शाखा सफल होगी

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रे क्रोक ने अपने दोस्तों वा रिश्तेदारों को बुलाया और उन सब को ऑफर दिया कि वे लोग मैकडॉनल्ड की शाखाओ को मालिक बन कर शुरू करे | रे क्रोक ने उन्हें अपना नाम मैकडॉनल्ड देने और सफल प्रणाली सिखाने का प्रस्ताव रखा और ये विश्वास भी दिलाया कि आप सभी को लाभ भी होगा | इस साझेदारी में रे क्रोक ने लाभ का 98% : 2% ऐसा प्रस्ताव भी रखा, यानी 98% शाखा के मालिक और 2% रे क्रोक का | लेकिन कई लोग इस प्रस्ताव के लिए नहीं माने | कई लोगो ने रे क्रोक को पागल भी कहा जो अपना व्यापार के रहस्य दूसरो को सिखाने के लिए तैयार था | ऐसा पागलपन पहले किसी ने नहीं किया था तभी कोई रिस्क नहीं लेना चाहता था | नैन्सी की रे क्रोक की कोई रिश्तेदारी थी, इस प्रस्ताव को माना और व्यापार जगत में नई क्रांति का शुभारंभ हुआ |

नैन्सी ने उसी डिजाईन का “मैकडॉनल्ड” की शाखा शुरू की | रे क्रोक ने नैन्सी की पूरी मदद की और उन्होंने अपने तीन सिद्धांत भी नैन्सी को समझाए | मैकडॉनल्ड की ये शाखा भी सफल हो गई | जो लोग पहले मैकडॉनल्ड की शाखाए खोलने के लिए नहीं राज़ी थे अब वो सब भी शाखाए खोलना चाहते थे |

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रे क्रोक की जब मृत्यु हुई तब मैकडॉनल्ड की 8000 शाखाए थी और 2016 तक ये संख्या 37000 तक पहुच गई |

 

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