कहानी एक बुजुर्ग जोड़े की -भाग ४

अभी तक आपने पढ़ा की कैसे नीरज और चित्रा मिले, कैसे उन्हें प्यार हुआ और जब उनके परिवार वालो को पता चला तो उनकी क्या प्रतिक्रिया हुई | अब पढ़िए आगे की कहानी

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चित्रा के घर वालो को पता लगने के बाद जैसे चित्रा पर दुखो का पहाड़ गिर पड़ा | चित्रा जहा सबकी चहेती थी वहीं सबकी नफरत की शिकार होने लगी | सभी लोग उसे कोसते और ताने मारते पर चित्रा का हौसला इससे बिलकुल भी नहीं टूटता था वो अपने निश्चय पर दृढ़ थी और किसी की बात पर उसको कोई फर्क नहीं पड़ता था | समय बीत रहा था पर उसके परिवार पर इसका कोई फर्क नहीं पड़ रहा था की चित्रा पर क्या बीत रही है उधर नीरज दूसरी नौकरी में व्यस्त हो गया था क्योकि उसके ऊपर पूरे परिवार की जिमीदारी भी थी | उसका भाई भी अब उम्र में काफी बड़ा हो गया था पर दिमाग से आज भी वैसा ही था इस लिए नीरज को उसपर विशेष ध्यान देना पड़ता था |

इसी बीच 1947 में खबर आ गयी भारत और पकिस्तान के अलग होने की और पूरा देश जैसे हिल सा गया | सभी लोग अपना सामान समेटने लगे और अपने सगे सम्बन्धी और जानकारों के साथ एक साथ इकठ्ठा होने लगे क्योकि किसी को नहीं पता था के अब आगे क्या होगा | अलग होने की खबर आते ही जैसे भारत और पकिस्तान की ज़मीन के साथ लोगो के मन भी दो भागो में बट से गए | देश दो भागो के साथ दो समुदाय हिन्दू – मुस्लिम में भी बट गया और वे एक दुसरे के खून के प्यासे हो गए | दोनों समुदाए के लोग एक दूसरे को मारने लगे और एक दूसरे की माँ बेटियो की इज्ज़त लूटने में भी कोई मौका नहीं छोड़ रहे थे |

भारत में मुसलमानों का क़त्ल होने लगा तो पाकिस्तान में हिन्दुओ का | भारत के मुसलमान पकिस्तान जाने लगे और पकिस्तान के हिन्दू भारत में आने लगे | सुरक्षित कोई नहीं था किसी भी समय किसी का भी क़त्ल कर दिया जा रहा था और कभी भी किसी का भी बलात्कार हो जा रहा था , सामान और पैसे की तो अब किसी को फिकर ही नहीं हो रही थी सभी सिर्फ जान बचा रहे थे |

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नीरज इन सभी बातो से काफी परेशान था क्योकि उसका भाई जो दिमाग से कमज़ोर था उसे संभालना बहुत मुश्किल था उसे कभी भी घर से बाहर नहीं ले जाया जाता था और अगर जाता भी था तो किसी न किसी के साथ ही जाता था पर अकेले कभी नहीं जाता था ऐसे में उसे घर से बाहर निकालना एक बड़ा ही मुश्किल काम था | नीरज के माँ बाप भी अब बूढ़े हो गए थें और उन्हें भी सिंध से भारत ले जाना बड़ी टेढ़ी खीर था |

उधर चित्रा के परिवार वाले भारत जाने की सारी व्यवस्था कर चुके थे | चित्रा के मामा पहले ही भारत के लखनऊ शहर में रहते थे और वे चित्रा के पूरे परिवार को बुलाने का इंतजाम कर चुके थे | जब चित्रा के पिता ने सारे इंतजाम कर लिए तो सभी को सामान बाँधने को बोला और बताया के हम कल सिंध छोड़ कर लखनऊ चले जाएँगे तो चित्रा ने साफ़ मना कर दिया कि वो नीरज के बगैर कही नहीं जाएगी , पर भोला तो वैसे भी उसकी बात सुनना बंद कर दिया था तो वो आज भी उसकी बात अनसुना करके वहा से चला गया |

दुसरे दिन सुबह ही भोला सबको लेकर निकल गया और चित्रा को भी जबरदस्ती ही ले गया | जब वो घर से निकले तो थोड़ी ही दूर पर देखा कि कुछ लोग सबको मार रहे है और उनके सामानों में आग लगा रहे है तो वे सब डर कर अपना रास्ता बदल लिए |

सिंध से तो वो निकल गए पर बॉर्डर तक आते आते चित्रा का भाई कही भीड़ में खो गया पर समय का ऐसा जाल बिछा था के वो उसे खोजने का रिस्क नहीं ले सकते थे ना ही उन्हें इतना समय था के वो उसे इतमिनान से खोज सके |

चित्रा उसकी बहन आतिया और उसके पिता तीनो आगे बढ़ रहे थे और यह सोच – सोच कर चित्रा रोए जा रही थी कि नीरज किस हाल में होगा और कहाँ होगा | भोला उसे देख कर अब दुखी हो रहा था पर उसके पास तुरंत लखनऊ जाने के अलावा और कोई रास्ता नहीं था | भोला बॉर्डर पर पहुचते ही पता करने लगा के कैसे वो भारत जाए तो किसी ने उसे बाताया के सरकार ने पानी वाले जहाज का इंतजाम किया है यहाँ से भारत जाने का | तब भोला ने भी वहा मौजूद अधिकारियो को घूस दी और इंतज़ाम किया कि वे सब पानी वाले जहाज से भारत जाए | पर तभी वहाँ मुस्लिम का पूरा समूह आ गया और सबको तलवारों से काटने लगा |

भोला ने तुरंत चित्रा और उसकी बहन को बोला जल्दी यहाँ से निकलो और पानी वाले जहाज पर चलो | तब तक वहा मौजूद पुलिस उनको कन्ट्रोल कर रही थी पर वे इतने ज्यादा थे कि वे सभी को रोक नहीं पा रहे थे | इसी बीच कुछ लोग आगे बढ़ गए और सबको मारने काटने लगे | उधर भोला जहाज पर पहुचने ही वाला था और जहाज भी भर चुका था और चलने को तैयार था जैसे ही भोला वहा पंहुचा तुरंत जहाज चलने लगा | भोला ने तुरंत चित्रा और उसकी बहन को बोला के जल्दी से जाहज पर बैठ जाओ | वे दोनों तुरंत जाहज पर कूद पड़ी और वहा खड़े लोगो ने दोनों को सहारा दिया और दोनों जाहज के ऊपर पहुच गई , अब बारी थी भोला के जहाज के ऊपर चढ़ने की | जब तक भोला चढ़ता तब तक जहाज की रफ़्तार तेज़ हो चुकी थी पर भोला जहाज को पकड़ने के लिए पीछे – पीछे जहाज के भाग रहा था और उसके पीछे कई मुस्लिम उसको पकड़ कर मारने के लिए भाग रहे थे | जैसे ही भोला ने जहाज पर चढ़ने की कोशिश की तुरंत कुछ लोगो ने उसका हाथ पकड़ लिया और जहाज के ऊपर खीचने लगे कि तभी गोली चलने की आवाज आई और वो भोला को आकर लगी | ये गोली उसी मुस्लिम में से किसी ने मारी थी जो भोला का पीछा कर रहे थे | तुरंत जहाज पर मौजूद लोगो ने भोला को ऊपर खीच लिया | भोला को गोली गर्दन के नीचे लगी थी जिससे उसे साँस लेने में दिक्कत हो रही थी और देखते ही देखते भोला जहाज पर ही थोड़ी ही देर में दम तोड़ दिया |

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भोला को मरते देख चित्रा और उसकी बहन के तो जैसे पैरो के नीचे से जमीन ही निकल गई | वे बहुत दुखी हो गई और भोला के पास आकार जोर जोर से रोने लगी | वहा मौजूद लोगो ने उन्हें बहुत समझाया पर उसका कोई फायदा नहीं हुआ और वो दिन भर अपने पिता से लिपट कर रोती रही और रात में भी उनका यही हाल था | दोनों बहनों को कुछ समझ नहीं आ रहा था के वे अब क्या करे और आगे कहा जाएंगी |

दुसरे दिन भी जहाज पर वे चुप चाप रोती रही | अब उसके पिता के शारीर से भी बदबू आने लगी थी पर दोनों अपने पिता से लिपटी हुई थी | शाम को जब वे भारत पहुची तो उनके सामने एक अलग ही दुनिया खड़ी थी | वहां लोग सब एक दुसरे की मदद कर रहे थे और खाने पीने का सामान एक दुसरे को दे रहे थे , पर चित्रा और उसकी बहन को भूख कहा लगनी थी |

उनके दिमाग में तो यह चल रहा था की वे अपने पिता के शरीर का क्या करे | उन दोनों ने एक दुसरे की हिम्म्त बाँधी और पास में पुलिस के पास जाकर मदद मांगी | पुलिस ने इंतजाम किया और उनके पिता का अंतिम संस्कार कराया जहा बाकी मरने वाले लोगो का भी किया जा रहा था |

आगे अगले भाग में पढ़िए क्या हुआ नीरज और उसके परिवार का और कैसे मिले चित्रा और नीरज कई सालो बाद |

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