ओशो के अनमोल वचन

osho

“सत्य को जानने की दिशा में पहला जो बड़ा काम है,

वह शब्दों को,शास्त्रों को,संप्रदायो को छोड़ देना है,

जो इन्हें जितने जोर से पकड़ेगा, उतना ही मुश्किल हो जाएगा,

उसे जानना , जो है”

 

“ध्यान इस जगत में सर्वाधिक बहुमूल्य घटना है,

ध्यान अर्थात मोन, ध्यान मतलब निर्विचार,

ध्यान अर्थात एक शून्य, चैतन्य की अवस्था,

जब चैतन्य तो पूरा होता है लेकिन

चैतन्य के समक्ष कोई विषय नहीं होता,

कोई विचार नहीं होता, बस चैतन्य मात्र”

 

“संसार का विरोध सन्यास नहीं है, संसार की शुद्धि सन्यास है,

अगर संसार में आप शुद्ध होते चले जाए,

एक दिन आएगा कि आप सन्यासी हो गए है,

सन्यासी कोई वेश परिवर्तन नहीं है,

संन्यास तो पूरे अंतस का परिवर्तन है”

 

“जीवन एक जादू है, एक तिलिस्म है,

इसको जीओ | इसको जानने की चेष्टा ही क्यों ?

धर्म का अर्थ होता है, पद का अर्थ होता है, प्रयोजन होता है,

क्योकि ये सब साधन है, इनसे कोई साध्य उपलब्ध हो सकता है|

जो साध्य है, वही तो अर्थ है |

लेकिन जीवन तो स्वयं साध्य है, किसी और का साधन नहीं |

इसीलिए इसका कैसे कोई अर्थ हो सकता है”

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“मेरा सन्देश छोटा सा है-आनन्द से जीओ, जीवन के समस्त रंगों को जीओ,

सारे स्वरों को जीओ, कभी भी निषेध नहीं करना है,

जो परमात्मा का है, शुभ है, जो भी उसने दिया है अर्थ पूण है”

 

“प्रेम की ना कोई शर्त है, ना कोई सौदा है, प्रेम है, तो परम मुक्ति है |

एक को भी अगर हम प्रेम कर ले, तो हम पाएंगे कि एक जो था,

वह दुवार बन गया अनेक का और कब एक मिट गया,

और प्रेम अनेक पर पहुच गया, कहना कठिन है”

 

“प्रेम असली धर्म है, ईश्वर को मानना ना मानना गौण बात है,

प्रेम असली धर्म है, सन्यास में दीक्षा प्रेम में दीक्षा है,

एक नया तीर्थ हम बना रहे है, प्रेम का तीर्थ,

जहा आस्तिक भी अंगीकार है, नास्तिक भी अंगीकार है”

 

“आनंद ही मेरा मूल सन्देश है,

सदियों से धर्म उदासी, दुःख, निराशा का पर्यायवाची हो गया है,

उस कारागृह से धर्म को मुक्त करना है,

धर्म पृथ्वी विरोधी हो गया है, धर्म देह विरोधी हो गया है,

धर्म उस सब के विरोध में हो गया है – जो है

धर्म ने ऐसे सपने संजोए है स्वर्ग के, परलोक के, कि जो मात्र सपने है,

जो सिर्फ प्रलोभन है, जो सरासर झूठ है,

जो है उसका इनकार और जो नहीं है उसका सत्कार,

ऐसा अब तक धर्म की तर्क – सरणी रही है,

मै उस पूरी तर्क – सरणी को तोड़ देना चाहता हूँ,

मै चाहता हूँ कि धर्म पृथ्वी के प्रेम में पड़े,

देह आत्मा विरोधी नहीं है, देह आत्मा का मंदिर है,

सम्मान दो उसे, सत्कार दो उसे,

क्योकि देह के मंदिर में परमात्मा विराजमान है”

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“धर्म प्रयोग है, विचार नहीं,

धर्म प्रक्रिया है, चिन्तना नहीं,

धर्म विज्ञानं है , दर्शन नहीं,

धर्म फिलोसफी नहीं है, साइंस है”

 

“सेवा से कुछ भी नहीं होता, जागो, होश सम्हालो,

तब तुम्हे दिखाई पड़ेगा कि आदमी दुखी है,

इसीलिए नहीं किदुनिया में शिक्षा कम है या दवाई कम है,

आदमी दुखी है इसीलिए कि दुनिया में ध्यान कम है,

लेकिन यह भी तुम्हे तभी पता चलेगा, जब तुम्हारा ध्यान जागेगा,

तुम्हारे दुःख विसर्जित हो जाएगा, तब तुम्हे पता चलेगा”

 

“मै समाज सेवक पैदा नहीं करना चाहता,

मै चाहता हूँ ऐसे लोग जो जीवंत है, जो आनन्द से भरे है,

जिनको आनन्द से अपने आप सेवा निकले,

उन्हें पता भी ना चले कि हम सेवा कर रहे है,

मै तुमसे कोई कर्तव्य करने को नहीं कह रहा हूँ,

मै चाहता हूँ, तुम्हारे जीवन में जो भी है, वह प्रेम से हो, कर्तव्य से नहीं,

कर्तव्य से जब भी कोई बात होती है, तो चूक हो जाती है,

कर्तव्य का मतलब यह होता है: करने की इच्छा नहीं है, कर रहे है – कर्तव्य है,

प्रेम से जब तुम करते हो तो कर्तव्य नहीं होता, तब तुम्हारा आनंद होता है, तुम्हारा रस होता है”

 

“स्वस्थ मनुष्य मै उसे कहता हूँ,

जो जिंदगी के रहस्य को मान कर चलता है,

पागल आदमी उसे कहते हूँ,

जो अपने नियम को जिंदगी पर थोपने की कोशिश कर रहा है”

 

“मेरी सारी निष्ठा व्यक्ति में है,

समाज में नहीं, राष्ट्र में नहीं,

अतीत में नहीं, भविष्य में नहीं,

मेरी सारी निष्ठा वर्तमान में और व्यक्ति में है,

क्योकि व्यक्ति ही रूपांतरित होता है, समाज रूपांतरित नहीं होते,

क्रांति व्यक्ति में होती है, व्यक्ति के पास आत्मा है,

जहा आत्मा है, वहा परमात्मा उतर सकता है,

समाज की कोई आत्मा नहीं होती, वहा परमात्मा की कोई सम्भावना नहीं है”

ये सभी अनमोल विचार ओशो की अलग अलग किताबो से लिए हुए है | आशा करते है कि आप को पसंद आएँगे |

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