धनतेरस : आरोग्य जीवन का आशीर्वाद

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आए जाने कैसे करे धन्वंतरी भगवान की पूजा 

धनतेरस एक ऐसा त्योहार है जो दिवाली से पहले आता है और पूरे देश में बहुत जोर शोर से मनाया जाता है | धनतेरस का बहुत ही महत्व है | धनतेरस के दिन ख़ास धन के लिए और आरोग्य जीवन पाने के लिए भक्त भगवान की पूजा करते है | इस दिन भगवान धनवंतरी को पूजा जाता है | आज के दिन लोग भगवान की पूजा के साथ साथ नए बर्तन खरीदते है और कई लोग आज के दिन सोना चांदी भी खरीदते है | ऐसा माना जाता है कि आज के दिन सोना चांदी खरीदना शुभ होता है | सब लोग परिवार के साथ शौपिंग का आनंद लेते है |

धन्वंतरी भगवान

शास्त्रों के अनुसार, कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी तिथि में धनवंतरी भगवान का जन्म हुआ था | आज ही के दिन धनवंतरी भगवान का जन्म हुआ था इसी लिए आज के ही दिन धनतेरस खूब विश्वास के साथ मनाया जाता है | शास्त्रों के अनुसार, धन्वंतरी देवताओ के वैध थे | धनवंतरी विष्णु भगवान के रूप माने जाते है | भगवान धन्वंतरी का जन्म समुंद्र मंथन के समय हुआ था | भगवान धन्वंतरी मंथन के समय अमृत का कलश और आयुर्वेद लेकर जन्मी थी | भगवान धन्वंतरी ने सभी देवताओ को अमृत पीला के उन्हें अमर बना दिया था | इसीलिए भगवान धन्वंतरी को आरोग्य का देवता कहते है | भगवान धन्वंतरी के जन्म के ठीक दो दिन बाद माँ लक्ष्मी प्रकट हुई थी इसीलिए धनतेरस दिवाली से दो दिन पहले मनाया जाता है | धनतेरस का अर्थ है – धन का अर्थ समृद्धि और तेरस का मतलब तेरहवां दिन होता है | ऐसा माना जाता है कि धनतेरस के दिन भगवान धन्वंतरी की पूजा करके आप अपने धन को तेरा गुणा बड़ा सकते है | आज के दिन माँ लक्ष्मी की पूजा करके आप अपने धन और कारोबार को तरक्की दिला सकते है | आप धन्वंतरी स्तोत्रम का जाप करके पूजा करे आप को ख़ास लाभ होगा |

जरुर पढ़े : Story behind Dhanteras in English

 धन्वंतरी स्तोत्रम

ॐ शंखं चक्रं जलौकां दधदमृतघटं चारुदोर्भिश्चतुर्मिः।

सूक्ष्मस्वच्छातिहृद्यांशुक परिविलसन्मौलिमंभोजनेत्रम॥

कालाम्भोदोज्ज्वलांगं कटितटविलसच्चारूपीतांबराढ्यम।

वन्दे धन्वंतरिं तं निखिलगदवनप्रौढदावाग्निलीलम॥

धनतेरस से जुड़ी एक ओर कथा है | शास्त्रों के अनुसार, कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी के दिन देवताओं के कार्य में बाधा डालने के कारण भगवान विष्णु ने असुरों के गुरू शुक्राचार्य की एक आंख फोड़ दी थी। कथा के अनुसार, भगवान विष्णु ने वामन अवतार लेके राजा बलि के यज्ञ स्थल पर पहुंच गये पर फिर भी  शुक्राचार्य ने भगवान विष्णु को पहचान लिया और राजा बलि से आग्रह किया कि वामन कुछ भी मांगे उन्हें इंकार कर देना। वामन साक्षात भगवान विष्णु हैं। बलि ने शुक्राचार्य की बात नहीं मानी। वामन भगवान ने बलि से तीन पग भूमि दान में मांगी | बलि  दान करने के लिए कमण्डल से जल लेकर संकल्प लेने लगे। बलि को रोकने के लिए शुक्राचार्य राजा बलि के कमण्डल में लघु रूप धारण करके प्रवेश कर गये। इससे कमण्डल से जल निकलने का मार्ग बंद हो गया। वामन भगवान शुक्रचार्य की चाल को समझ गये। भगवान वामन ने अपने हाथ में रखे हुए कुशा को कमण्डल में ऐसे रखा कि शुक्राचार्य की एक आंख फूट गयी। शुक्राचार्य छटपटाकर कमण्डल से निकल आये। बलि ने संकल्प लेकर तीन पग भूमि दान कर दिया।
इसके बाद भगवान वामन ने अपने एक पैर से संपूर्ण पृथ्वी को नाप लिया और दूसरे पग से अंतरिक्ष को। तीसरा पग रखने के लिए कोई स्थान नहीं होने पर बलि ने अपना सिर वामन भगवान के चरणों में रख दिया। बलि दान में अपना सब कुछ गंवा बैठा। इस तरह बलि के भय से देवताओं को मुक्ति मिली और बलि ने जो धन-संपत्ति देवताओं से छीन ली थी उससे कई गुणा धन-संपत्ति देवताओं को मिल गयी। इस उपलक्ष्य में भी धनतेरस का त्योहार मनाया जाता है।

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