अधुरा मायका

मायका नाम का शब्द सुनते ही किसी भी शादी – शुदा लड़की के मन में बहुत सारे विचार आ जाते हैं | कुछ अच्छे, कुछ बुरे, कुछ खट्टे मीठे, माँ – पिता की यादें | भाई बहनों की मस्तियाँ , बचपन का खेल और बहुत कुछ | पर मायका तो मायका होता है जिसे भूला नहीं जा सकता | मायके में दो लोगों का होना संभवतः सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है जिसमे माँ और पिता की भूमिका अहम् है |
मैं आज एक ऐसी ही कहानी बताने जा रहा हूँ जिसमे मायका तो है पर वो अधूरा ही रह गया |
ये कहानी है लखनऊ की एक लड़की की जिसका नाम है कुसुम | वो अपने माँ- पिता की इकलौती लड़की थी | ग्रेजुएट होने के लिए उसने कानपुर के एक नामी यूनिवर्सिटी में दाखिला ले लिया और अपने सपने पूरे करने के लिए आगे की पढाई शुरू कर दी . पहले दिन जब वो यूनिवर्सिटी में गई तो उसे ऐसा लगा जैसे कोई जलपरी को पूरा समुंदर दे दिया गया हो | उसके मन की उमंगों में जैसे किसी ने पंख लगा दिया हो | वो बहुत ही खुश और संतुष्ट थी | वहीँ उसके माँ – पिता भी बहुत ही खुश थे और गौरान्वित भी , और होते भी क्यों न , उनकी एकलौती बेटी ने उनके पूरे खानदान का नाम जो रौशन किया था यूनिवर्सिटी में मेरिट लिस्ट में पहले पायदान पर आकर |
समय बीतता गया और वो दिन भी आ गया जब कुसुम का रिजल्ट आने वाला था और वो ग्रेजुएट होने वाली थी | रिजल्ट निकलने से पहले कुसुम ने ऐसा महसूस किया की उसके पेट में तितलियाँ उड़ रही हों , तितलियाँ भी ऐसी जो सुबह से थकने का नाम ही नहीं ले रही थीं . कुसुम का मन कई बातों से उलझन में था | यूनिवर्सिटी का रिजल्ट, आगे का भविष्य और उससे भी कुछ ज्यादा महत्वपूर्ण उसका एक दोस्त जो दोस्त से अब कुछ बढ़कर हो गया था , जिसे कुसुम रिज़ल्ट के बाद अपने माँ – पिता से मिलवाने वाली थी |
रिज़ल्ट आ गया और वही हुआ जिसकी उम्मीद थी, कुसुम पहले पायदान पर थी और पूरी यूनिवर्सिटी में अव्वल थी | अब समय आ गया था जब कुसुम को घर पर दोनों के बारे में बताना था .
कुसुम लखनऊ के अपने घर पहुँची जहाँ उसका बचपन बीता था, जहा वो बड़ी हुई, और जहाँ पर उसके माता – पिता आज उसके स्वागत की तैयारी कर रहे थे . कुसुम को अंदाज़ा था कि कुछ तो तूफ़ान उठेगा .
वो घर के अन्दर जैसे ही घुसी उसके स्वागत के लिए सभी घर के लोग बहार आ गए | वो भी बहार आए जिनका इंतज़ार कुसुम कर रही थी, उसके माँ – पिता . सभी कुसुम को बधाई दे रहे थे | कुसुम अब घर के अन्दर आई और अपना सामान रखा | अब कुसुम ने बोला पापा ये अंकित है मेरा दोस्त … उसके माँ – पिता कुछ समझ पाते तभी कुसुम ने बोला , हम साथ पढ़ते थे और अब हमने साथ शादी करने का फैसला कर लिया है |
माँ – पिता जो अभी बेटी के स्वागत के आगोश में डूबे हुए थे उनके पैरो के नीचे से ज़मीन निकल गई | उनको ऐसा लगा जैसे पूरी दुनिया ही पलट गई हो , जैसे पेड़ उड़ रहे हो और पक्षी जमीं में धस गए हों , जैसे पहाड़ धरातल में चला गया हो और समुंदर ऊँचाईयों को छु रहा हो , कि तभी कुसुम के पिता बोले , हम अब इस बारे में कोई बात नहीं करेंगे , तुम्हे जो करना है करो और इस घर से निकल जाओ . निकल जाओ…??? ये क्या बोल रहे हैं आप कुसम की माँ ने पूछा ? उसके पिता ने फिर से बोला मुझे इस बारे में कोई बात नहीं करनी है और अगर ये लोग नहीं जा रहे तो मैं चला जाता हूँ | उस दिन के बाद कुसुम कभी घर नहीं आई |
आज सात साल हो चुके थे, उसके पिता कहीं दूसरे शहर से वापस लौट रहे थे | उस दिन बारिश बहुत तेज़ हो रही थी और बस में बैठे – बैठे बाहर का नज़ारा देख रहे थे कि तभी बस रूक गई | काफी देर बस यूँही खड़ी रही जैसे किसी का इंतज़ार कर रही हो के तभी कंडक्टर आया और बोला, आगे रास्ता बंद है कुछ पेड़ गिर गए हैं रस्ते में और 2- 3 घंटा लगेगा , पास में एक क़स्बा है आपलोग चाहें तो कुछ खा – पी कर आ सकते हैं .
सभी लोग अपनी – अपनी सीट से उठ कर बाहर निकलने लगे जैसे कोई जेल से कैदी निकलें हों | वो भी निकले …. पर बस से निकलते ही उनके कदम रुक से गए , कुसुम ??? वो अपने मन में बोले . जिस बस में वो चार घंटे से बैठे थे उसमे उनकी बेटी भी थी | वो बेटी जिनको उन्होंने सात साल पहले भुला दिया था , वो बेटी जो उनको छोड़ कर किसी और के साथ चली गई थी, वो बेटी जो उनकी लाडली हुआ करती थी , वो बेटी जो उनके प्यार- सम्मान के बारे में एक बार भी नहीं सोचा था , उनका मन प्यार और गुस्से दोनों से भर गया था और एक छोटे बच्चे की तरह उन्होंने मुँह फेर लिया जैसे वो उसको जानते ही न हों |
कुसुम ने भी अपने पिता को देखा और दूसरी तरफ चल दी | सभी लोग कसबे की तरफ जा रहे थे उसी झुण्ड में वो दोनों भी जाने लगे | एक ढाबे पर सभी रुके और बैठ गए, उसके पिता भी बैठ गए , तभी आवाज़ आई दो चाए देना भैया , एक में चीनी कम डालना . उसके पिता ने झट से अपनी बेटी की आवाज़ पहचान ली और मन में बोले मेरी बेटी को आज भी यद् है कि मई कम चीनी वाली चाय पीता हूँ | कुसुम उनके बगल में आकर बैठ गई , उनके हाथ पर हाथ रख कर बोली , मुझे पता चला दादा जी का , बहुत दुःख हुआ पर मजबूर थी आ नहीं सकी | कुसुम के दादा जी इसी महीने गुज़र गए थे और उसके पिता के ऊपर से बड़ों का साया चला गया था , वो बहुत उदास रहने लगे थे और तभी कुसुम ने सोचा था कि अब पिता को अकेले नहीं रहने देगी और कैसे ना सोचती आखिर उसने भी तो पिता से दुरी का दुःख सात साल तक झेला था |
उसके पिता ने सात साल बाद पहली बार बेटी से बात की और पूछा , तुहें किसने बताया ? क्या तुम्हारी माँ से बात होती है ? कुसुम ने हाँ में सर हिलाया , उसके पिता ने फिर पुछा क्या तुम घर आती हो ? उसने ना कहा | कुसुम ने फिर बोला मुझे पता है आप पर क्या गुजर रही है , मैं समझ सकती हूँ पिता का साथ छूटने से कितना दुःख होता है . उसके पिता ने उसकी आँखों में आँख मिलाई और कहा तुमने अच्छा नहीं किया और अपनी बेटी को रोते हुए गले लगा लिया | दोनों का बाँध टूट गया था | दोनों का मन अब हलका हो गया था और दोनों एक दुसरे को देख कर मुस्कुरा रहे थे और घर की ओर चलने लगे | आज सात साल बाद आज कुसुम का अधुरा मायका पूरा हो गया था |

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