Best Quotes of Mirza Ghalib

mirzaghalib

इश्क से तबियत ने जीस्त का मजा पाया,

दर्द की दवा पाई दर्द बे-दवा पाया।

आता है दाग-ए-हसरत-ए-दिल का शुमार याद,

मुझसे मेरे गुनाह का हिसाब ऐ खुदा न माँग।

तेरी वफ़ा से क्या हो तलाफी की दहर में,

तेरे सिवा भी हम पे बहुत से सितम हुए।

जी ढूंढ़ता है फिर वही फुर्सत के रात दिन,

बैठे रहे तसव्वुर-ए-जहान किये हुए।

कहते तो हो यूँ कहते, यूँ कहते जो यार आता,

सब कहने की बात है कुछ भी नहीं कहा जाता।

चांदनी रात के खामोश सितारों की क़सम,

दिल में अब तेरे सिवा कोई भी आबाद नहीं।

आशिकी सब्र तलब और तमन्ना बेताब,

दिल का क्या रंग करूँ खून-ए-जिगर होने तक।

की हमसे वफ़ा तो गैर उसको जफा कहते हैं,

होती आई है की अच्छी को बुरी कहते हैं।

आया है बे-कसी-ए-इश्क पे रोना ग़ालिब,

किसके घर जायेगा सैलाब-ए-बला मेरे बाद।

आता है दाग-ए-हसरत-ए-दिल का शुमार याद,

मुझसे मेरे गुनाह का हिसाब ऐ खुदा न माँग।

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