माता पिता के प्यार की कहानी – Story about Parents love

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“माँ की ममता, पिता की क्षमता का कोई अंदाजा नहीं लगा सकता”

आज की कहानी माता पिता के प्यार की है | जीवन में आप कितने ही रिश्ते निभा लो मगर जो सच्चाई माँ बाप के प्यार में मिलेगी वो दुनिया में आप को कही नहीं मिले गी | अपना सब कुछ खो कर माँ बाप हमको बनाते है पर पता नहीं क्यू कुछ बनने के बाद बच्चे अपने माँ बाप को क्यू भूल जाते है |

यह कहानी है संदीप मिश्रा की | संदीप अपनी पत्नी गीता के साथ दिल्ली में लक्ष्मी नगर में एक छोटे से घर में रहता था | उसने ये घर किराए पे लिया था जिसका वो हर महीने 8000 रुपए देता था | संदीप के माता पिता कुशी नगर गाव में रहते थे जो की उत्तर प्रदेश में  है | संदीप के पिता किसान थे | संदीप पढ़ लिख कर दिल्ली चला गया और वहा उसे अच्छी नौकरी भी मिल गई | लेकिन दिल्ली जैसे बड़े शहर में खरचे भी बहुत होते है | संदीप कमाता तो अच्चा था पर बहुत कम ही saving कर पाता था | कई महीने से संदीप अपने काम में बहुत ज्यादा व्यस्त हो गया था | उसको कुछ पैसो की परेशानी भी हो गई थी | वो आज कल काफी चिंता में रहता था |

एक दिन सुबह सुबह जब संदीप पूजा कर रहा था तब अचानक से घर की घंटी बजती है | संदीप की पत्नी गीता दरवाजा खोलती है और देखती है सामने तो उसके ससुर जी खड़े है | गीता उनके पैर छू कर उन्हें प्रणाम करती है और वही संदीप अपने पापा को देख कर चिंता में आ जाता है | संदीप को उसके पापा आवाज़ लागते है “क्या हुआ खुश नहीं हो हमें देख कर” | संदीप नहीं नहीं पापा आप को अचानक देखा तो bas यू ही | संदीप उनके पैर छू कर उन्हें कमरे में ले आता है | संदीप और गीता एक दुसरे से आँखों ही आँखों में बाते कर रहे होते है | संदीप का हाथ वैसे ही टाइट था और उसे डर था की कही पापा उस से कोई पैसो की मदद तो नहीं लेने आए | संदीप ने कई महीनो से अपने घर में कोई पैसा नहीं भेजा था |

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वही गीता पापा को चाय पिला कर, उनके नहाने के लिए पानी गरम कर रही होती है | संदीप के पापा उनसे पूछते है “बेटा सब ठीक तो है न” तू उदास क्यू दिख रहा है | संदीप कहता है ऐसा कुछ नहीं है पापा, सब ठीक है | संदीप अपने दिमाग में सोचता है की कही पापा ने पैसे मांगे तो मै क्या बोलूँगा, पैसो का इंतजाम कैसे करूँगा तभी उसके पापा बोलते है फिर कहा खो गए बेटा, संदीप नहीं पापा कही नहीं | तभी गीता आवाज़ लगा के कहती है “आई पापा पानी गरम हो गया है नहा लीजिये” | जैसे ही वो नहाने जाते है तब गीता संदीप से पूछती है “पापा क्यू आए है, कही उनको पैसो की तो जरुरत नहीं” | संदीप कहता है पता नहीं उसी बात की तो मुझे चिंता है | गीता बोली अब क्या होगा कुछ समझ नहीं आ रहा | इतने में संदीप के पापा बहार आ जाते है | गीता उनसे खाने के लिए पूछती है तो वे कहते है “आज तो मै अपने बेटे बहु के साथ खाऊंगा” | गीता जल्दी से खाना लगा देती है और सब मिल के खाना खाने के लिए बैठ जाते है | एक अजीब सी खामोशी भी उनके आस पास होती है | संदीप के पापा गाव की बाते करने लगते है और संदीप सिर्फ हमम हमम कर रहा होता है और वही गीता भी सर निचे कर के सिर्फ खाने में देख रही होती है | उन दोनों को डर था कही ज्यादा बात करने से पापा उनसे पैसे ना मांग ले | दोनों ही पापा को एक तरह से ignor कर रहे थे | लेकिन संदीप के पापा का ध्यान बातो और खाने में था | वे अपने बेटे से इतने दिनों बाद मिले थे तो वे बहुत खुश थे |

संदीप के पापा संदीप से पूछते है अच्छा तम्हारा काम कैसे चल रहा है, अब संदीप को और डर लगता है की अब तो पक्का थोड़ी देर बाद पापा पैसे मांगे गे | संदीप सब ठीक है पापा | संदीप के पापा बेटा तम्हारे चहेरे से तो नहीं लगता | कोई परेशानी है तो हम को बताओ हम ठीक कर देंगे | तभी संदीप सोचता है अभी मै इनको अपनी परेशानी बताऊंगा तो फिर ये भी मुझे अपनी परेशानी बताएँगे | वही गीता भी डरी बैठी थी की कही पापा कुछ मांग ना ले |

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खाना खाने के बाद जब सब कमरे में बैठे तो संदीप के पापा ने उसके हाथ में 30000 रुपये दिए | संदीप और गीता जैसे हैरान ही हो गए | संदीप पापा ये क्या | संदीप के पापा बोले रख लो बेटा तुम्हे जरुरत में काम आएगा | इस बार गाव में फसल अच्छी हुई है और फसलो के दाम भी अच्छे मिले है | तेरी माँ और मुझे तो कुछ ख़ास जरुरत नहीं पर तू तो बड़े शहर में रहता है, तुझे जरुरत पड़ती रहती होगी | बड़े शहर के खर्चे भी बड़े होते है बच्चे | ये सब देख कर जैसे संदीप और गीता अपने ही आँखों में गिर गए थे | दोनों ये सोच रहे थे कि हम कितने स्वार्थी है, एक बार भी पापा से उनका हाल नहीं पूछा | और पापा है कि बिन कहे ही हमारी परेशानी समझ गए | दोनों के आँखों में जैसे पानी ही आ गया |

तभी संदीप के पापा संदीप से कहते है, बेटा कभी कभी हम से मिलने आ जाया करो | तम्हारी माँ दरवाज़े में खड़ी तुम्हारी रहा देखती है | हम दोनों के लिए तो सब कुछ तुम ही हो | मानते है तुम शहर में काफी व्यस्त रहते होंगे पर कभी कभी हमें याद किया करो | बस अपना हाल सुना दिया करो कि तुम दोनों ठीक हो | बस इतना सुनने के लिए ही हम जीते है | ये सुन कर संदीप पापा के गले लग कर रोने लगा | अरे बेटा, क्या हुआ | संदीप कुछ नहीं पापा, आज फिर से आपने मुझे याद दिला दिया की मै आज भी आप का बेटा हु और आप मेरे पापा | आगे से आप को शिकायत का मौका नहीं दूंगा | संदीप के पापा, चल ab रोना बंद कर, मै हस कर जाना चाहता हु | संदीप, आप अभी चले जाएंगे, नहीं पापा कुछ दिन तो रुको | नहीं बेटा तेरी माँ घर में अकेली है और मुझे भी जरुरी काम है | किसी और दिन जरुर रुकुंगा | इस के बाद संदीप हर महीने अपने माता पिता को मिलने जाने लगा और अब तो गीता भी संदीप को हर महीने माँ पापा से मिलने को कहती |

हम कितने ही बड़े क्यू न हो जाए मगर हम अपने माँ बाप के लिए हमेशा बच्चे ही रहते है | हम अपना समय हर किसी को देते है पर कही ना कही हम उनको भूल जाते है जिन्होंने हमारे लिए अपना सब कुछ त्यागा है | माँ बाप अपने बच्चो का चेहरा देख के सब पता लगा लेते है कि उन्हें क्या चाहिए | उसी तरह से हमारा भी येही फ़र्ज़ बनता है कि हम इस बात का ध्यान रखे कि उनको क्या चाहिए |

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