दर्द की नई पह्चान

hindi poem

अपनो  को  छोड़ गैरो  में आई  मै

गैरो को अपना समझा बहुत  पछ्ताई   मै

मेरे दर्द में भी दर्द ना दिखे

एसी  जगह  है ये  मेरे  लिए

मांग  भरते  ही दुनिया  का रंग दिखने लगा

सिक्के के दो पहलू का हर ढंग दिखने लगा

माँ के स्पर्श को तरस  सी गए मै

सर पे कोई हाथ फेरे, बिखर सी गई मै

अस्तिव के टुकडें दुर तक जा गिरे  है

कही दिल तो कही जहन  घायल पड़े  है

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